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आश्रम की प्रथम पत्रिका ज्ञान-दर्शन ऑनलाइन प्रति बुक करें शारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर 2026 से शुरू होकर 20 अक्टूबर 2026 (विजयादशमी) तक रहेगी। सुविचार -- " इंसान जैसा भी अच्छा या बुरा कर्म करता है वैसा ही फल मिलता है I"

मंदिर कार्यक्रम और पर्व

आश्रम की सेवा, सत्संग और पर्व परंपरा

2.ब्रह्मचारिणी
12 Oct 2026

2.ब्रह्मचारिणी

ब्रह्मचारिणी माँ की नवरात्र पर्व के दूसरे दिन पूजा-अर्चना की जाती है । साधक इस दिन अपने मन को माँ के चरणों में लगाते हैं। ब्रह्म का अर्थ है तपस्या और चारिणी यानी आचरण करने वाली। इस प्रकार ब्रह्मचारिणी का अर्थ हुआ तप का आचरण करने वाली। इनके दाहिने हाथ में जप की माला एवं बाएँ हाथ में कमण्डल रहता है। यह जानकारी भविष्य पुराण से ली गई हे।
माँ दुर्गाजी का यह दूसरा स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनन्तफल देने वाला है। इनकी उपासना से मनुष्य में तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्धि होती है। जीवन के कठिन संघर्षों में भी उसका मन कर्तव्य-पथ से विचलित नहीं होता।

माँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन इन्हीं के स्वरूप की उपासना की जाती है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ’चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है।

इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनका विवाह तय हो गया है लेकिन अभी शादी नहीं हुई है। इन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र, पात्र आदि भेंट किए जाते हैं।

शैलपुत्री देवी
11 Oct 2026

शैलपुत्री देवी

शैलपुत्री देवी दुर्गा के नौ रूप में पहले स्वरूप में जानी जाती हैं। ये ही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। पर्वतराज हिमालय के घर पुत्री रूप में उत्पन्न होने के कारण इनका नाम 'शैलपुत्री' पड़ा[2]। नवरात्र-पूजन में प्रथम दिवस इन्हीं की पूजा और उपासना की जाती है। इस प्रथम दिन की उपासना में योगी अपने मन को 'मूलाधार' चक्र में स्थित करते हैं। यहीं से उनकी योग साधना का प्रारंभ होता है।
एक बार प्रजापति दक्ष ने एक बहुत बड़ा यज्ञ किया। इसमें उन्होंने सारे देवताओं को अपना-अपना यज्ञ-भाग प्राप्त करने के लिए निमंत्रित किया, किन्तु शंकरजी को उन्होंने इस यज्ञ में निमंत्रित नहीं किया। सती ने जब सुना कि उनके पिता एक अत्यंत विशाल यज्ञ का अनुष्ठान कर रहे हैं, तब वहाँ जाने के लिए उनका मन विकल हो उठा।

अपनी यह इच्छा उन्होंने शंकरजी को बताई। सारी बातों पर विचार करने के बाद उन्होंने कहा- प्रजापति दक्ष किसी कारणवश हमसे रुष्ट हैं। अपने यज्ञ में उन्होंने सारे देवताओं को निमंत्रित किया है। उनके यज्ञ-भाग भी उन्हें समर्पित किए हैं, किन्तु हमें जान-बूझकर नहीं बुलाया है। कोई सूचना तक नहीं भेजी है। ऐसी स्थिति में तुम्हारा वहाँ जाना किसी प्रकार भी श्रेयस्कर नहीं होगा।'

शंकरजी के इस उपदेश से सती का प्रबोध नहीं हुआ। पिता का यज्ञ देखने, वहाँ जाकर माता और बहनों से मिलने की उनकी व्यग्रता किसी प्रकार भी कम न हो सकी। उनका प्रबल आग्रह देखकर भगवान शंकरजी ने उन्हें वहाँ जाने की अनुमति दे दी।

सती ने पिता के घर पहुँचकर देखा कि कोई भी उनसे आदर और प्रेम के साथ बातचीत नहीं कर रहा है। सारे लोग मुँह फेरे हुए हैं। केवल उनकी माता ने स्नेह से उन्हें गले लगाया। बहनों की बातों में व्यंग्य और उपहास के भाव भरे हुए थे।

परिजनों के इस व्यवहार से उनके मन को बहुत क्लेश पहुँचा। उन्होंने यह भी देखा कि वहाँ चतुर्दिक भगवान शंकरजी के प्रति तिरस्कार का भाव भरा हुआ है। दक्ष ने उनके प्रति कुछ अपमानजनक वचन भी कहे। यह सब देखकर सती का हृदय क्षोभ, ग्लानि और क्रोध से संतप्त हो उठा। उन्होंने सोचा भगवान शंकरजी की बात न मान, यहाँ आकर मैंने बहुत बड़ी गलती की है।

वे अपने पति भगवान शंकर के इस अपमान को सह न सकीं। उन्होंने अपने उस रूप को तत्क्षण वहीं योगाग्नि द्वारा जलाकर भस्म कर दिया। वज्रपात के समान इस दारुण-दुःखद घटना को सुनकर शंकरजी ने क्रुद्ध होअपने गणों को भेजकर दक्ष के उस यज्ञ का पूर्णतः विध्वंस करा दिया।

सती ने योगाग्नि द्वारा अपने शरीर को भस्म कर अगले जन्म में शैलराज हिमालय की पुत्री के रूप में जन्म लिया। इस बार वे 'शैलपुत्री' नाम से विख्यात हुर्ईं। पार्वती, हैमवती भी उन्हीं के नाम हैं। उपनिषद् की एक कथा के अनुसार इन्हीं ने हैमवती स्वरूप से देवताओं का गर्व-भंजन किया था।

श्लोक

शारदीय नवरात्र
11 Oct 2026

शारदीय नवरात्र

आश्विन मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर 9 दिन तक चलने वाला नवरात्र 'शारदीय नवरात्र' कहलाता है। 'नव' का शाब्दिक अर्थ नौ है। इसके अतिरिक्त इसे नव अर्थात नया भी कहा जा सकता है।शारदीय नवरात्रों में दिन छोटे होने लगते हैं। मौसम में परिवर्तन प्रारंभ हो जाता है। प्रकृति सर्दी की चादर में सिकुड़ने लगती है। ऋतु के परिवर्तन का प्रभाव जनों को प्रभावित न करे इसलिए प्राचीनकाल से ही इस दिन से 9 दिनों के उपवास का विधान है। नवरात्रों में माता के 9 रूपों की आराधना की जाती है। माता के इन 9 रूपों को हम देवी के विभिन्न रूपों की उपासना, उनके तीर्थों के माध्यम समझ सकते हैं।वर्ष में दो बार नवरात्र रखने का विधान है। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से 9 दिन अर्थात नवमी तक और इसी प्रकार ठीक 6 मास बाद आश्विन मास, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से विजयादशमी से एक दिन पूर्व तक माता की साधना और सिद्धि प्रारंभ होती है। दोनों नवरात्रों में शारदीय नवरात्रों को ज्यादा महत्व दिया जाता है।

इंदिरा एकादशी
06 Oct 2026

इंदिरा एकादशी

• पितृ पक्ष के दौरान आने वाली इस एकादशी का व्रत करने से पितरों को मोक्ष और वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होती है।
• इस व्रत के पुण्य को पितरों को समर्पित करने से उनकी यमयातनाएं समाप्त होती हैं और वे प्रसन्न होकर वंशजों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

परिवर्तिनी एकादशी
22 Sep 2026

परिवर्तिनी एकादशी

धार्मिक मान्यता के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं और परिवर्तिनी एकादशी के दिन अपनी करवट बदलते हैं. इसी वजह से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है. इसे पार्श्व एकादशी, पद्मा एकादशी और वामन एकादशी के नाम से भी जाना जाता है
परिवर्तिनी एकादशी की पौराणिक कथापौराणिक कथा के अनुसार, त्रेतायुग में राजा बलि नामक एक दैत्यराज था। वह अत्यंत दानशील, सत्यवादी और भगवान विष्णु का परम भक्त था। अपनी भक्ति और बल के कारण उसने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया और देवराज इंद्र को हरा दिया।देवताओं ने घबराकर भगवान विष्णु से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने देवताओं की सहायता के लिए वामन (बौना) अवतार धारण किया।भगवान वामन राजा बलि के पास गए और उनसे केवल तीन पग (कदम) पृथ्वी दान में मांगी। राजा बलि ने इसे बहुत छोटा दान समझकर स्वीकार कर लिया। संकल्प लेते ही वामन भगवान ने अपना विशाल रूप प्रकट किया। उन्होंने पहले पग में पूरी पृथ्वी नाप ली और दूसरे पग में स्वर्गलोक को ढंक लिया।जब तीसरा पग रखने के लिए कोई जगह नहीं बची, तब वचन के पक्के राजा बलि ने अपना सिर भगवान के आगे झुका दिया और कहा कि तीसरा पग आप मेरे सिर पर रखें। राजा बलि की इस भक्ति और सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें पाताल लोक का स्वामी बना दिया।भगवान विष्णु ने राजा बलि को यह भी वचन दिया कि वे हमेशा उनके साथ रहेंगे। मान्यता है कि भाद्रपद शुक्ल एकादशी के दिन ही भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग पर सोते हुए अपनी मुद्रा बदलते (करवट लेते) हैं, इसलिए इसे परिवर्तिनी या पार्श्व एकादशी कहा जाता है।
राजा मानधाता की कथाएक अन्य कथा के अनुसार, सतयुग में चक्रवर्ती राजा मानधाता के राज्य में कई वर्षों तक अकाल (सूखा) पड़ा, जिससे प्रजा बहुत दुखी हुई। राजा अपनी समस्या लेकर महर्षि वशिष्ठ के आश्रम पहुंचे।महर्षि वशिष्ठ ने राजा मानधाता को भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की 'पद्मा यानी परिवर्तिनी एकादशी' का विधि-विधान से व्रत रखने का उपदेश दिया। राजा ने अपने राज्य की प्रजा के साथ यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से राज्य में अच्छी वर्षा हुई और चारों ओर सुख-समृद्धि व धन-धान्य फैल गया।

अजा एकादशी
07 Sep 2026

अजा एकादशी

हिन्दू धर्म में भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु को समर्पित है और इसे सभी पापों का नाश करने वाला माना गया है।
धार्मिक महत्वपापों से मुक्ति: मान्यता है कि अजा एकादशी का व्रत रखने से व्यक्ति के पिछले जन्मों के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।अश्वमेघ यज्ञ का फल: धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, इस व्रत को पूरी श्रद्धा से करने पर अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।मोक्ष की प्राप्ति: इस व्रत के प्रभाव से मृत्यु के बाद भक्त को विष्णुलोक (बैकुंठ धाम) की प्राप्ति होती है।राजा हरिश्चंद्र की कथा: पौराणिक कथा के अनुसार, सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र ने संकट के दिनों में महर्षि गौतम के कहने पर अजा एकादशी का व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से उनके सारे कष्ट दूर हुए और उनका खोया हुआ राज्य तथा परिवार वापस मिल गया।

कृष्ण जन्माष्टमी
04 Sep 2026

कृष्ण जन्माष्टमी

कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाने वाला एक प्रमुख हिंदू त्योहार है।
यह त्योहार हर साल भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मनाया जाता है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण का जन्म मथुरा की एक कारागार में मध्यरात्रि (रात 12 बजे) रोहिणी नक्षत्र में हुआ था।श्री कृष्ण को भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना गया है।उनका जन्म धरती से अन्याय, पाप और कंस जैसे दुष्टों का नाश करने तथा धर्म की स्थापना के लिए हुआ था।
व्रत: भक्तजन, भगवान कृष्ण के प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करने के लिए जन्माष्टमी के पूरे दिन व्रत रखते हैं और रात में जन्म के समय पूजा के बाद पारण करते हैं।मध्यरात्रि अभिषेक: रात 12 बजे बाल गोपाल (कृष्ण के बाल स्वरूप) का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल यानी पंचामृत से अभिषेक किया जाता है।श्रृंगार और भोग: भगवान को नए वस्त्र पहनाए जाते हैं और माखन-मिश्री, पंजीरी, खीर तथा फलों का भोग लगाया जाता है। भोग में तुलसी दल अवश्य रखा जाता है।झूला झुलाना: लड्डू गोपाल को पालने या झूले में बिठाकर प्रेम से झुलाया जाता है।दही हांडी: जन्माष्टमी के अगले दिन महाराष्ट्र और देश के अन्य हिस्सों में 'दही हांडी' का उत्सव बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है, जो कृष्ण की बाल लीलाओं की याद दिलाता है।

सावन का दूसरा सोमवार
10 Aug 2026

सावन का दूसरा सोमवार

सावन का दूसरा सोमवार -- सावन के दूसरे सोमवार को शिवलिंग पर जल चढ़ाने से भगवान शिव की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इससे मन को शांति मिलती है, जीवन के कष्ट व बाधाएं दूर होती हैं, स्वास्थ्य सुधरता है, और भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

कामिका एकादशी 2026
09 Aug 2026

कामिका एकादशी 2026

कामिका एकादशी 2026 -यह व्रत भगवान विष्णु की कृपा पाने, पापों से मुक्ति और सभी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए रखा जाता है।मान्यता है कि इस व्रत को करने से ब्रह्महत्या जैसे बड़े पाप और अन्य सभी दोष नष्ट हो जाते हैं।